रविदासिया धर्म — "अमृतवाणी" — सतिगुरु रविदास महाराज जी — आरती

"अमृतवाणी" — सतिगुरु रविदास महाराज जी |

"अमृतवाणी"— शिरोमणि सतगुरु रविदास महाराज जी

भजन, आरती और अरदास


जगत गुरु सतगुरु रविदास महाराज जी आरती • भजन प्रकाशित: 19 अक्टूबर 2025
"अमृतवाणी":सतगुरु रविदास महाराज जी

"अमृतवाणी" — सतिगुरु रविदास महाराज जी (चालीस शब्द)

॥ सिरीरागु ॥


तोही मोही मोही तोही अंतरू कैसा।। कनक कटिक जल तरंग जैसा।।

जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता।। पतित पावन नामु कैसे हुंता।। रहाउ।।

तुमह जु नाइक आछहु अंतरजामी।। प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी।।

सरीर आराधै मोकउ बीचारू देहू।। रविदास समदल समझायै कोउ।।


॥ रागु गउड़ी ॥


मेरी संगति पोच सोच दिनु राती ॥ मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभांती ॥१॥

राम गुसईआ जीअ के जीवना ॥ मोहि न बिसारहु मै जनु तेरा ॥१॥ रहाउ ॥

मेरी हरहु बिपति जन करहु सुभाई ॥ चरण न छाडउ सरीर कल जाई ॥२॥

कहु रविदास परउ तेरी साभा ॥ बेगि मिलहु जन करि न बिलांबा ॥३॥१॥


॥ रागु गउड़ी ॥


बेगम पुरा सहर को नाउ ॥ दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ ॥

नां तसवीस खिराजु न मालु ॥ खउफु न खता न तरसु जवालु ॥१॥

अब मोहि खूब वतन गह पाई ॥ ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥

काइमु दाइमु सदा पातिसाही ॥ दोम न सेम एक सो आही ॥

आबादानु सदा मसहूर ॥ ऊहां गनी बसहि मामूर ॥२॥

तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै ॥ महरम महल न को अटकावै ॥

कहि रविदास खलास चमारा ॥ जो हम सहरी सु मीतु हमारा ॥३॥२


॥ गउड़ी बैरागणि ॥


घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥

रमईए सिउ इक बेनती मेरी पूंजी राखु मुरारि ॥१॥

को बनजारो राम को मेरा टांडा लादिआ जाइ रे ॥१॥ रहाउ ॥

हउ बनजारो राम को सहज करउ ब्यापारु ॥

मै राम नाम धनु लादिआ बिखु लादी संसारि ॥२॥

उरवार पार के दानीआ लिखि लेहु आल पतालु ॥

मोहि जम डंडु न लागई तजीले सरब जंजाल ॥३॥

जैसा रंगु कसुमभ का तैसा इहु संसारु मेरे रमईए रंगु मजीठ का कहु रविदास चमार ॥४॥१॥


॥ गउड़ी पूरबी ॥


कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥

ऐसे मेरा मनु बिखिआ बिमोहिआ कछु आरा पारु न सूझ ॥१॥

सगल भवन के नाइका इकु छिनु दरसु दिखाइ जी ॥१॥ रहाउ ॥

मलिन भई मति माधवा तेरी गति लखी न जाइ ॥

करहु क्रिपा भ्रमु चूकई मै सुमति देहु समझाइ ॥२॥

जोगीसर पावहि नही तुअ गुण कथनु अपार ॥

प्रेम भगति कै कारणै कहु रविदास चमार ॥३॥१॥


॥ गउड़ी बैरागणि ॥


सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार ॥

तीनौ जुग तीनौ दिड़े कलि केवल नाम अधार ॥१॥

पारु कैसे पाइबो रे ॥

मो सउ कोऊ न कहै समझाइ ॥

जा ते आवा गवनु बिलाइ ॥१॥ रहाउ ॥

बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसै सभ लोइ ॥

कवन करम ते छूटीऐ जिह साधे सभसिधि होइ ॥२॥

करम अकरम बीचारीऐ संका सुनि बेद पुरान ॥

संसा सद हिरदै बसै कउनु हिरै अभिमानु ॥३॥

बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतरि बिबिधि बिकार ॥

सुध कवन पर होइबो सुच कुंचर बिधि बिउहार ॥४॥

रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभसंसार ॥

पारस मानो ताबो छुए कनक होत नही बार ॥५॥

परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट ॥

उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट ॥६॥

भगति जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार ॥

सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार ॥७॥

अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरै भ्रम फास ॥

प्रेम भगति नही ऊपजै ता ते रविदास उदास ॥८॥१॥


॥ गउड़ी पूरबी ॥


कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥

ऐसे मेरा मनु बिखिआ बिमोहिआ कछु आरा पारु न सूझ ॥१॥

सगल भवन के नाइका इकु छिनु दरसु दिखाइ जी ॥१॥ रहाउ ॥

मलिन भई मति माधवा तेरी गति लखी न जाइ ॥

करहु क्रिपा भ्रमु चूकई मै सुमति देहु समझाइ ॥२॥

जोगीसर पावहि नही तुअ गुण कथनु अपार ॥

प्रेम भगति कै कारणै कहु रविदास चमार ॥३॥१॥


॥ रागु आसा ॥


म्रिग मीन भिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनास ॥

पंच दोख असाध जा महि ता की केतक आस ॥१॥

माधो अबिदिआ हित कीन ॥ बिबेक दीप मलीन ॥१॥ रहाउ ॥

त्रिगद जोनि अचेत स्मभव पुंन पाप असोच ॥

मानुखा अवतार दुलभ तिही संगति पोच ॥२॥

जीअ जंत जहा जहा लगु करम के बसि जाइ ॥

काल फास अबध लागे कछु न चलै उपाइ ॥३॥

विदास दास उदास तजु भ्रमु तपन तपु गुर गिआन ॥

भगत जन भै हरन परमानंद करहु निदान ॥४॥१॥


॥ रागु आसा ॥


संत तुझी तनु संगति प्रान ॥

सतिगुर गिआन जानै संत देवा देव ॥१॥

संत ची संगति संत कथा रसु ॥

संत प्रेम माझै दीजै देवा देव ॥१॥ रहाउ

संत आचरण संत चो मारगु संत च ओल्हग ओल्हगणी ॥२॥

अउर इक मागउ भगति चिंतामणि ॥

जणी लखावहु असंत पापी सणि ॥३॥

रविदासु भणै जो जाणै सो जाणु ॥

संत अनंतहि अंतरु नाही ॥४॥२॥


॥ रागु आसा ॥


तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासा ॥

नीच रूख ते ऊच भए है गंध सुगंध निवासा ॥१॥

माधउ सतसंगति सरनि तुम्हारी ॥ हम अउगन तुम्ह उपकारी ॥१॥ रहाउ ॥

तुम मखतूल सुपेद सपीअल हम बपुरे जस कीरा ॥

सतसंगति मिलि रहीऐ माधउ जैसे मधुप मखीरा ॥२॥

जाती ओछा पाती ओछा ओछा जनमु हमारा ॥

राजा राम की सेव न कीनी कहि रविदास चमारा ॥३॥३॥


॥ रागु आसा ॥


कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु ॥ प्रेमु जाइ तउ डरपै तेरो जनु ॥१॥

तुझहि चरन अरबिंद भवन मनु ॥ पान करत पाइओ पाइओ रामईआ धनु ॥१॥ रहाउ ॥

स्मपति बिपति पटल माइआ धनु ॥ ता महि मगन होत न तेरो जनु ॥२॥

प्रेम की जेवरी बाधिओ तेरो जन ॥ कहि रविदास छूटिबो कवन गुन ॥३॥४॥


॥ रागु आसा ॥

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे ॥ हरि सिमरत जन गए निसतरि तरे ॥१॥रहाउ ॥

हरि के नाम कबीर उजागर ॥ जनम जनम के काटे कागर ॥१॥

निमत नामदेउ दूधु पीआइआ ॥ तउ जग जनम संकट नही आइआ ॥२॥

जन रविदास राम रंगि राता ॥ इउ गुर परसादि नरक नही जाता ॥३॥५॥


॥ रागु आसा ॥


माटी को पुतरा कैसे नचतु है ॥ देखै देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरतु है ॥१॥ रहाउ ॥

जब कछु पावै तब गरबु करतु है ॥ माइआ गई तब रोवनु लगतु है ॥१॥

मन बच क्रम रस कसहि लुभाना ॥ बिनसि गइआ जाइ कहूं समाना ॥२॥

कहि रविदास बाजी जगु भाई ॥ बाजीगर सउ मोहि प्रीति बनि आई ॥३॥६॥


॥ रागु गूजरी ॥


दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥ फूलु भवरि जलु मीनि बिगारिओ ॥१॥

माई गोबिंद पूजा कहा लै चरावउ ॥ अवरु न फूलु अनूपु न पावउ ॥१॥रहाउ ॥

मैलागर बेहें है भुइअंगा ॥ बिखु अम्रितु बसहि इक संगा ॥२॥

धूप दीप नईबेदहि बासा ॥ कैसे पूज करहि तेरी दासा ॥३॥

तनु मनु अरपउ पूज चरावउ ॥ गुर परसादि निरंजनु पावउ ॥४॥

पूजा अरचा आहि न तोरी ॥ कहि रविदास कवन गति मोरी ॥५॥१॥


॥ रागु सोरठि ॥


जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही ॥

अनल अगम जैसे लहरि मइ ओदधि जल केवल जल मांही ॥१॥

माधवे किआ कहीऐ भ्रमु ऐसा ॥ जैसा मानीऐ होइ न तैसा ॥१॥ रहाउ ॥

नरपति एकु सिंघासनि सोइआ सुपने भइआ भिखारी ॥

अछत राज बिछुरत दुखु पाइआ सो गति भई हमारी ॥२॥

राज भुइअंग प्रसंग जैसे हहि अब कछु मरमु जनाइआ ।

अनिक कटक जैसे भूलि परे अब कहते कहनु न आइआ ॥३॥

सरबे एकु अनेकै सुआमी सभ घट भोगवै सोई ॥

कहि रविदास हाथ पै नेरै सहजे होइ सु होई ॥४॥१॥


॥ रागु सोरठि ॥


जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥

अपने छूटन को जतनु करहु हम छूटे तुम आराधे ॥१॥

माधवे जानत हहु जैसी तैसी ॥ अब कहा करहुगे ऐसी ॥१॥ रहाउ ॥

मीनु पकरि फांकिओ अरु काटिओ रांधि कीओ बहु बानी ॥

खंड खंड करि भोजनु कीनो तऊ न बिसरिओ पानी ॥२॥

आपन बापै नाही किसी को भावन को हरि राजा ॥

मोह पटल सभु जगतु बिआपिओ भगत नही संतापा ॥३॥

कहि रविदास भगति इक बाढी अब इह का सिउ कहीऐ ॥

जा कारनि हम तुम आराधे सो दुखु अजहू सहीऐ ॥४॥२॥


॥ रागु सोरठि ॥


दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥

राजे इंद्र समसरि ग्रिह आसन बिनु हरि भगति कहहु किह लेखै ॥१॥

जिह रस अन रस बीसरि जाही ॥१॥ न बीचारिओ राजा राम को रसु ॥रहाउ ॥

जानि अजान भए हम बावर सोच असोच दिवस जाही ॥

इंद्री सबल निबल बिबेक बुधि परमारथ परवेस नही ॥२॥

कहीअत आन अचरीअत अन कछु समझ न परै अपर माइआ ॥

कहि रविदास उदास दास मति परहरि कोपु करहु जीअ दइआ ॥३॥३॥


॥ रागु सोरठि ॥


सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥

चारि पदारथ असट दसा सिधि नव निधि कर तल ता के ॥१॥

हरि हरि हरि न जपहि रसना ॥ अवर सभ तिआगि बचन रचना ॥१॥रहाउ ॥

नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अखर मांही ॥

बिआस बिचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥२॥

सहज समाधि उपाधि रहत फुनि बडै भागि लिव लागी ॥

कहि रविदास प्रगासु रिदै धरि जनम मरन भै भागी ॥३॥४॥


॥ रागु सोरठि ॥


जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा ॥ जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा ॥१॥

माधवे तुम न तोरहु तउ हम नही तोरहि ॥ तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि ॥१॥ रहाउ ॥

जउ तुम दीवरा तउ हम बाती ॥ जउ तुम तीरथ तउ हम जाती ॥२॥

साची प्रीति हम तुम सिउ जोरी ॥ तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरी ॥३॥

जह जह जाउ तहा तेरी सेवा ॥ तुम सो ठाकुरु अउरु न देवा ॥४॥

तुमरे भजन कटहि जम फांसा ॥ भगति हेत गावै रविदासा ॥५॥५॥


॥ रागु सोरठि ॥


जल की भीति पवन का थ्मभा रकत बुंद का गारा ॥

हाड मास नाड़ीं को पिंजरु पंखी बसै बिचारा ॥१॥

प्रानी किआ मेरा किआ तेरा ॥ जैसे तरवर पंखि बसेरा ॥१॥ रहाउ ॥

राखहु कंध उसारहु नीवां ॥ साढे तीनि हाथ तेरी सीवां ॥२॥

बंके बाल पाग सिरि डेरी ॥ इहु तनु होइगो भसम की ढेरी ॥३॥

ऊचे मंदर सुंदर नारी ॥ राम नाम बिनु बाजी हारी ॥४॥

मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जनमु हमारा ॥

तुम सरनागति राजा राम चंद कहि रविदास चमारा ॥५॥६॥


॥ रागु सोरठि ॥


चमरटा गांठि न जनई ॥ लोग गठावै पनही ॥१॥ रहाउ ॥

आर नही जिह तोपउ ॥ नही रांबी ठाउ रोपउ ॥१॥

लोग गंठि गंठि खरा बिगूचा ॥ हउ बिनु गांठे जाइ पहूचा ॥२॥

रविदासु जपै राम नामा ॥ मोहि जम सिउ नाही कामा ॥३॥७॥


॥ रागु धनासरी ॥


हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि अब पतीआरु किआ कीजै ॥

बचनी तोर मोर मनु मानै जन कउ पूरनु दीजै ॥१॥

हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥ कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥

बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥

कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥


॥ रागु धनासरी ॥


चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ ॥

मनु सु मधुकरु करउ चरन हिरदे धरउ रसन अम्रित राम नाम भाखउ ॥१॥

मेरी प्रीति गोबिंद सिउ जिनि घटै ॥ मै तउ मोलि महगी लई जीअ सटै ॥१॥रहाउ ॥

साधसंगति बिना भाउ नही ऊपजै भाव बिनु भगति नही होइ तेरी ॥

कहै रविदासु इक बेनती हरि सिउ पैज राखहु राजा राम मेरी ॥२॥२॥


॥ रागु धनासरी ॥


नामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥ हरि के नाम बिनु झूठे सगल पासारे ॥१॥ रहाउ ॥

नामु तेरो आसनो नामु तेरो उरसा नामु तेरा केसरो ले छिटकारे ॥

नामु तेरा अमभुला नामु तेरो चंदनो घसि जपे नामु ले तुझहि कउ चारे ॥१॥

नामु तेरा दीवा नामु तेरो बाती नामु तेरो तेलु ले माहि पसारे ॥

नाम तेरे की जोति लगाई भइयो उजिआरो भवन सगलारे ॥२॥

नामु तेरो तागा नामु फूल माला भार अठारह सगल जूठारे ॥

तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नामु तेरा तुही चवर ढोलारे ॥३॥

दस अठा अठसठे चारे खाणी इहै वरतणि है सगल संसारे ॥

कहै रविदासु नामु तेरो आरती सति नामु है हरि भोग तुहारे ॥४॥३॥


॥ रागु जैतसरी ॥


नाथ कछूअ न जानउ ॥ मनु माइआ कै हाथि बिकानउ ॥१॥ रहाउ ॥

तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ॥ हम कहीअत कलिजुग के कामी ॥१॥

इन पंचन मेरो मनु जु बिगारिओ ॥ पलु पलु हरि जी ते अंतरु पारिओ ॥२॥

जत देखउ तत दुख की रासी ॥ अजौं न पत्याइ निगम भए साखी ॥३॥

गोतम नारि उमापति स्वामी ॥ सीसु धरनि सहस भग गांमी ॥४॥

इन दूतन खलु बधु करि मारिओ ॥ बडो निलाजु अजहू नही हारिओ ॥५॥

कहि रविदास कहा कैसे कीजै ॥ बिनु रघुनाथ सरनि का की लीजै ॥६॥ १॥

॥ रागु सूही ॥


सह की सार सुहागनि जानै ॥ तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै ॥

तनु मनु देइ न अंतरु राखै ॥ अवरा देखि न सुनै अभाखै ॥१॥

सो कत जानै पीर पराई ॥ जा कै अंतरि दरदु न पाई ॥१॥ रहाउ ॥

दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी ॥ जिनि नाह निरंतरि भगति न कीनी ॥

पुर सलात का पंथु दुहेला ॥ संगि न साथी गवनु इकेला ॥२॥

दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ ॥ बहुतु पिआस जबाबु न पाइआ ॥

कहि रविदास सरनि प्रभ तेरी ॥ जिउ जानहु तिज तिउ करु गति मेरी ॥३॥१॥


॥ रागु सूही ॥


जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥ करना कूचु रहनु थिरु नाही ॥

संगु चलत है हम भी चलना ॥ दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना ॥१॥

किआ तू सोइआ जागु इआना ॥ तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अमबरावै ॥ सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥

करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥ हिरदै नामु सम्हारि सवेरा ॥२॥

जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥ सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥

कहि रविदास निदानि दिवाने ॥ चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥३॥२॥


॥ रागु सूही ॥


ऊचे मंदर साल रसोई ॥ एक घरी फुनि रहनु न होई ॥१॥

इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥ जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥१॥ रहाउ ॥

भाई बंध कुट्मब सहेरा ॥ ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥२॥

घर की नारि उरहि तन लागी ॥ उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥३॥

कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥ हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥४॥३॥


॥ रागु बिलावलु ॥


दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी ॥ असट दसा सिधि कर तलै सभ क्रिपा तुमारी ॥१॥

तू जानत मै किछु नही भव खंडन राम ॥ सगल जीअ सरनागती प्रभ पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥

जो तेरी सरनागता तिन नाही भारु ॥ ऊच नीच तुम ते तरे आलजु संसारु ॥२॥

कहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करीजै ॥ जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजै ॥३॥१॥


॥ रागु बिलावलु ॥


जिह कुल साधु बैसनौ होइ ॥ बरन अबरन रंकु नही ईसुरु बिमल बासु जानीऐ जगि सोइ ॥१॥ रहाउ॥

ब्रहमन बैस सूद अरु ख्यत्री डोम चंडार मलेछ मन सोइ ॥

होइ पुनीत भगवंत भजन ते आपु तारि तारे कुल दोइ ॥१॥

धंनि सु गाउ धंनि सो ठाउ धंनि पुनीत कुट्मब सभ लोइ ॥

जिनि पीआ सार रसु तजे आन रस होइ रस मगन डारे बिखु खोइ ॥२॥

पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ ॥

जैसे पुरैन पात रहै जल समीप भनि रविदास जनमे जगि ओइ ॥३॥२॥

॥ रागु गोंड ॥

मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥ बिनु मुकंद तनु होइ अउहार ॥

सोई मुकंदु मुकति का दाता ॥ सोई मुकंदु हमरा पित माता ॥१॥

जीवत मुकंदे मरत मुकंदे ॥ ता के सेवक कर सदा अनंदे ॥१॥ रहाउ ॥

मुकंद मुकंद हमारे प्रानं ॥ जपि मुकंद मसतकि नीसानं ॥

सेव मुकंद करै बैरागी ॥ सोई मुकंदु दुरबल धनु लाधी ॥२॥

एकु मुकंदु करै उपकारु ॥ हमरा कहा करै संसारु ॥

मेटी जाति हुए दरबारि ॥ तुही मुकंद जोग जुग तारि ॥३॥

उपजिओ गिआनु हूआ परगास ॥ करि किरपा लीने कीट दास ॥

कहु रविदास अब त्रिसना चूकी ॥ जपि मुकंद सेवा ताहू की ॥४॥१॥


॥ रागु गोंड ॥


जे ओहु अठसठि तीरथ न्हावै ॥ जे ओहु दुआदस सिला पूजावै ॥

जे ओहु कूप तटा देवावै ॥ करै निंद सभ बिरथा जावै ॥१॥

साध का निंदकु कैसे तरै ॥ सरपर जानहु नरक ही परै ॥१॥ रहाउ

जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति ॥ अरपै नारि सीगार समेति ॥

सगली सिम्रिति स्रवनी सुनै ॥ करै निंद कवनै नही गुनै ॥२॥

जे ओहु अनिक प्रसाद करावै ॥ भूमि दान सोभा मंडपि पावै ॥

अपना बिगारि बिरांना सांदै ॥ करै निंद बहु जोनी हांदै ॥३॥

निंदक का परगटि पाहारा ॥ निंदकु सोधि साधि बीचारिआ ॥

कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ ॥ निंदा कहा करहु संसारा ॥

४॥२॥११॥७॥२॥४९॥ जोड्डु ॥


॥ रागु रामकली ॥

पड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ अनभउ भाउ न दरसै ॥

लोहा कंचनु हिरन होइ कैसे जउ पारसहि न परसै ॥१॥ देव संसै गांठि न छूटै ॥

काम क्रोध माइआ मद मतसर इन पंचहु मिलि लूटे ॥१॥ रहाउ ॥

हम बड कबि कुलीन हम पंडित हम जोगी संनिआसी ॥

गिआनी गुनी सूर हम दाते इह बुधि कबहि न नासी ॥२॥

कहु रविदास सभै नही समझसि भूलि परे जैसे बउरे ॥

मोहि अधारु नामु नाराइन जीवन प्रान ॥

कहु रविदास सभै नही समझसि भूलि परे जैसे बउरे ॥

मोहि अधारु नामु नाराइन जीवन प्रान धन मोरे ॥३॥१॥


॥ रागु मारू ॥


ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥

गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥१॥ रहाउ ॥

जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै ॥

नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥१॥

नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै

कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै ॥२॥१॥


॥ रागु मारू ॥


सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥

चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि कर तल ता कै ॥१॥

अवर सभ छाडि बचन रचना ॥१॥ हरि हरि हरि न जपसि रसना ॥ रहाउ ॥

नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही ॥

बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥२॥

सहज समाधि उपाधि रहत होइ बडे भागि लिव लागी ॥

कहि रविदास उदास दास मति जनुम मरन भै भागी ॥३॥२॥१५॥


॥ रागु केदारा ॥


खटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहि ॥

चरनारबिंद न कथा भावै सुपच तुलि समानि ॥१॥

रे चित चेति चेत अचेत ॥ काहे न बालमीकहि देख ॥

किसु जाति ते किह पदहि अमरिओ राम भगति बिसेख ॥१॥ रहाउ ॥

सुआन सत्रु अजातु सभ ते क्रिस्न लावै हेतु ॥

लोग बपुरा किआ सराहै तीनि लोक प्रवेस ॥२॥

अजामलु पिंगुला लुभतु कुंचरु गए हरि कै पासि ॥

ऐसे दुरमति निसतरे तू किउ न तरहि रविदास ॥३॥१॥


॥ रागु भैरउ ॥


बिनु देखे उपजै नही आसा ॥ जो दीसै सो होइ बिनासा ॥

बरन सहित जो जापै नामु ॥ सो जोगी केवल निहकामु ॥१॥

परचै रामु रवै जउ कोई ॥ पारसु परसै दुबिधा न होई ॥१॥ रहाउ ॥

सो मुनि मन की दुबिधा खाइ ॥ बिनु दुआरे त्रै लोक समाइ ॥

मन का सुभाउ सभु कोई करै ॥ करता होइ सु अनभै रहै ॥२॥

फल कारन फूली बनराइ ॥ फलु लागा तब फूलु बिलाइ ॥

गिआनै कारन करम अभिआसु ॥ गिआनु भइआ तह करमह नासु ॥३॥

घ्रित कारन दधि मथै सइआन ॥ जीवत मुकत सदा निरबान ॥

कहि रविदास परम बैराग ॥ रिदै रामु की न जपसि अभाग ॥४॥१॥


॥ रागु बसंतु ॥


तुझहि सुझंता कछू नाहि ॥ पहिरावा देखे ऊभि जाहि ॥

गरबवती का नाही ठाउ ॥ तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ ॥१॥

तू कांइ गरबहि बावली ॥ जैसे भादउ खूमबराजु तू तिस ते खरी उतावली ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे कुरंक नही पाइओ भेदु ॥ तनि सुगंध ढूढै प्रदेसु ॥

अप तन का जो करे बीचारु ॥ तिसु नही जमकंकरु करे खुआरु ॥२॥

पुत्र कलत्र का करहि अहंकारु ॥ ठाकुरु लेखा मगनहारु ॥

फेड़े का दुखु सहै जीउ ॥ पाछे किसहि पुकारहि पीउ पीउ ॥३॥

साधू की जउ लेहि ओट ॥ तेरे मिटहि पाप सभ कोटि कोटि ॥

कहि रविदास जो जपै नामु ॥ तिसु जाति न जनमु न जोनि कामु ॥४॥१॥


॥ रागु मलार ॥


नागर जनां मेरी जाति बिखिआत चमारं ॥

रिदै राम गोबिंद गुन सारं ॥१॥ रहाउ ॥

सुरसरी सलल क्रित बारुनी रे संत जन करत नही पानं ॥

सुरा अपवित्र नत अवर जल रे सुरसरी मिलत नहि होइ आनं ॥१॥

तर तारि अपवित्र करि मानीऐ रे जैसे कागरा करत बीचारं ॥

भगति भागउतु लिखीऐ तिह ऊपरे पूजीऐ करि नमसकारं ॥२॥

मेरी जाति कुट बांढला ढोर ढोवंता नितहि बानारसी आस पासा ॥

अब बिप्र परधान तिहि करहि डंडउति तेरे नाम सरणाइ रविदासु दासा ॥३॥१॥


॥ रागु मलार ॥


हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास सम तुलि नही आन कोऊ ॥

एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूरि सोऊ ॥ रहाउ ॥

जा कै भागवतु लेखीऐ अवरु नही पेखीऐ तास की जाति आछोप छीपा ॥

बिआस महि लेखीऐ सनक महि पेखीऐ नाम की नामना सपत दीपा ॥१॥

जा कै ईदि बकरीदि कुल गऊ रे बधु करहि मानीअहि सेख सहीद पीरा ॥

जा कै बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी तिहू रे लोक परसिध कबीरा ॥२॥

जा के कुट्मब के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरहि अजहु बनारसी आस पासा ॥

आचार सहित बिप्र करहि डंडउति तिन तनै रविदास दासान दासा ॥३॥२॥


॥ रागु मलार ॥


मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते ॥ साधसंगति पाई परम गते ॥ रहाउ ॥

मैले कपरे कहा लउ धोवउ ॥ आवैगी नीद कहा लगु सोवउ ॥१॥

जोई जोई जोरिओ सोई सोई फाटिओ॥ झूठे बनजि उठि ही गई हाटिओ ॥२॥

कहु रविदास भइओ जब लेखो ॥ जोई जोई कीनो सोई सोई देखिओ ॥ ३॥१॥३॥


आरती — नामु तेरो आरती

नामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥ हरि के नाम बिनु झूठे सगल पासारे ।।। ।। रहाउ ।।

नामु तेरो आसनो नामु तेरो उरसा नामु तेरा केसरो ले छिटकारे ॥


नामु तेरा अंभुला नामु तेरो चंदनो घसि जपे नामु ले तुझहि कउ चारे ॥1 ॥

नामु तेरा दीवा नामु तेरो बाती ।। नामु तेरो तेलु ले माहि पसारे ॥


नाम तेरे की जोति लगाई भइओ उजिआरो भवन सगलारे ।।2 ।।

नामु तेरो तागा नामु फूल माला भार अठारह सगल जूठारे ॥


तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नामु तेरा तुही चवर ढोलारे ॥3 ॥

दस अठा अठसठे चारे खाणी इहै वरतणि है सगल संसारे ॥


कहै रविदास नामु तेरो आरती सतिनामु है हरि भोग तुहारे ॥4॥

अरदास - श्लोक

हम सरि दीनु दआलु न तुम सरि, अब पतीआरू किआ कीजै।।

बचनी तोर मोर मनु मानै, जन कउ पुरनू दीजै।।

हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने।। कारन कवन अबोल।। रहाउ।।

बहुत जन्म बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुमहारे लेखे।।

कहि रविदास आस लगि जीवो चिर भइओ दरसनु देखे।।


हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस।। ते नर दोजक जाहिगे सति भाखै रविदास।।


जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


तोही मोही मोही तोही अंतरू कैसा।। कनक कटिक जल तरंग जैसा।।

जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता।। पतित पावन नामु कैसे हुंता।। रहाउ।।

तुमह जु नाइक आछहु अंतरजामी।। प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी।।

सरीर आराधै मोकउ बीचारू देहू।। रविदास समदल समझायै कोउ।।

जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


दारिदु देखि सभ को हसै, ऐसी दसा हमारी।। असट दसा सिधि कर तलै सभ क्रिपा तुमारी।।१।।

तू जानत मै किछु नहीं भवखंडन राम।। सगल जीअ सरनागती प्रभ पूरन काम।।१।। रहाउ।।

जो तेरी सरनागता तिन नाही भारु।। ऊच नीच तुम ते तरे आलजु संसारू।। २।।

कहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करीजै।। जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजै ।। ३ ।। १ ।।


जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।। हरि सिमरत जन गए निसतरि तरे।। १ ।। रहाउ।।

हरि के नाम कबीर उजागर।। जनम जनम के काटे कागर१।।

निमत नामदेउ दूधु पीआइआ।। तउ जग जनम संकट नहीं आइआ।। २।।

जन रविदास राम रंगि राता।। इउ गुर परसादि नरक नहीं जाता।। ३ ।। ५।।


जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


अरदास - विनती सतगुरु रविदास महाराज जी के चरणों में

जगत गुरु, कुल्ल गुरु, धर्म गुरू, राज गुरू, गुरुओ के गुरु, धंन धंन सतिगुरु रविदास महाराज जीयो, धंन धंन वालमीकि महाराज जीयो, धंन धंन सतिगुरु कबीर जीयो, धंन धंन सतिगुरू फरीद जी महाराज जीयो, धंन धंन सतिगुरु नामदेव जीयो, धन धन सतिगुरू सधना जी महाराज जीयो, धंन धंन सतिगुरू सैण जी महाराज जीयो, धंन धंन सतिगुरू त्रिलोचन जी महाराज जीयो, धंन धंन संत भीलणी जी महाराज जीयो, धंन धंन संत मीरा बाई जी महाराज जीयो, सभी संतों महापुरुषो की सेवा सिमरन और चरन कमलों का दा धयान धर के


धंन धंन सतिगुरु रविदास महाराज जी के जन्म असथान मंदिर सीर गोवर्धनपुर कांशी बनारस सभी ही गुरुधामर्मों का ध्यान धर के


जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


सतिगुरु रविदास महाराज जी की धुर की बाणी संचखड बेगमपुरे का ग्यान कराने वाली, दुखो का निवारण करने वाली श्री अमृतवाणी का ध्यान धर के


जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


रविदासीया धर्म के अमर शहीद संत रामानंद महाराज जीयो व रविदिासीया समाज के सारे ही शहीदों की शहादत का ध्यान धर के


जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


हे निमाणियां के माण निताणियां के ताण, निउटियां की ओट, निगतियां की गति, निपतियो की पत, निथाविओं के थाव, निगुरिआं के गुरू, धंन धंन सतिगुरू रविदास महाराज जीयो आप जी के चर्न कमलों में अरदास बेनती है जी, के....................................


अंम्रित वेले से ही श्री अंम्रित बाणी जी के जाप हो रहे सन, आप जी क्रिपा से जाप संपन्न हुए, आप जी के सेवादारो की तरफ से श्री अंत्रित बाणी को सुंदर रुमाला साहिब अर्पित किये गये, हरिजीओ सतिगुरु रविदास महाराज जीयो,


आप जी की रसना के लिये हलवा प्रशाद, लंगर भेंट किया है। आप जी को भोग लगे।


कहि रविदास नाम तेरो आरती, सतिनाम हरि भोग तुहारे


भोग लगा हुया प्रशाद व लंगर संगतों में वरताया जाये। धन धन सतिगुरु रविदास महाराज जीयो आप के चरनों में आई हुई संगतों की सेवा भेंटा प्रवान करनी। सभी साध संगतो की मनोकामनाए सम्पूर्ण करें, परिवारों में सत्य संतोख, तंदरुस्ती, बखशिश करें, देश प्रदेश सहायता करें। रविदासीया समाज को चड़दी कला में रखना, सभी साध संगत को बे-गम करना, सरबत का भला करना।


सतिगुरु रविदास कुल कारज करने रास, तेरे नाम की चड़दी होवे कला, तेरे भाणे सरबत का भला।


जपो जी सतिनाम, सतिनाम, सतिनामु जियो।


“प्रेम पंथ की पालकी रविदास बैठियो आय ।
सांचे सामी मिलन कू आनंद कह्यो न जाय ॥ ७०॥”

आयो अपने ईशट की मन में धरीये आस, और देव ना पूजीये, पूजो गुरु रविदास।


जो बोले सोंह निरभैय सतिगुरु रविदास महाराज की जै।


बोले सो निरभैय भगवान वालमीकि महाराज की जै।


सतिगुरु रविदास शक्ति अमर है, सतिगुरु रविदास शकित अमर है, सतिगुरु रविदास शक्ति अमर है, सतिगुरु रविदास शक्ति, अमर है, सतिगुरु रविदास शक्ति, अमर है।


जो बोले सोह निरमैय सतिगुरु रविदास महाराज की जै।


जै गुरूदेव, धंन गुरूदेव


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