सतगुरु रविदास महाराज जी के गुरु कौन है ?

गुरु की महिमा – सद्गुरु रविदास महाराज की वाणी

गुरु की महिमा – सद्गुरु रविदास महाराज के विचार

गुरु की महिमा

गुरु का अर्थ और आवश्यकता

'गु + रु' दो धातुओं से बना शब्द "गुरु" अंधकार को दूर कर प्रकाश देने वाले का द्योतक है। जो हमें ज्ञान दे, मार्गदर्शन करे, सही दिशा प्रदान करे – वही गुरु है।

जिस प्रकार समाज में रहकर हम सामाजिक गुरुओं द्वारा अच्छा नागरिक बनने की शिक्षा ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार उस परम-पिता परमेश्वर से मिलाने के लिए किसी परम गुरु की आवश्यकता पड़ती है। आदिकाल में यह कार्य शिक्षक ही कर देते थे क्योंकि उस समय धार्मिक शिक्षा देना ही जीवन का मूल उद्देश्य होता था। पुस्तकों के ज्ञान का इतना महत्त्व नहीं होता था । धार्मिक शिक्षा और अस्त्र-शस्त्र की विद्या ही प्रदान की जाती थी, तभी उस शिक्षा देने वाले को 'गुरु' कहा जाता था। शिक्षक, अध्यापक आदि शब्द बाद में प्रचलित हुए हैं। गुरु और शिक्षक में यही अंतर है कि गुरु जिन बातों की शिक्षा देता है उन्हें पहले वह अपने जीवन में अपनाता है। उसका जीवन ही शिक्षा का साधन होता है। मानव जन्म से ही गुरु परंपरा जुड़ी रही। माँ गर्भ से पहले और विद्यालय में शिक्षक जीवन भर मार्गदर्शन देते हैं – परंतु परमात्मा से मिलाने हेतु “पूर्ण गुरु” आवश्यक होता है।

“मेरे राम हम बारिक हरि प्रभ के हैं इयाणे ।”
“धन्नु धन्नु गुरु गुर गुर सतिगुरु पाधा जिन हरि उपदेशु दे कीये सयाने।”
(गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 168)
मानव का मूल उद्देश्य 'परमार्थ' है और इस मंज़िल तक पहुंचने के लिए हमें गुरु की आवश्यकता पड़ती है। सभी महापुरुषों ने गुरु धारण करने के महत्त्व को स्वीकारा है। उनके अनुसार गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। तुलसीदास जी ने तो यहाँ तक कह दिया है ।

गुरु और शिक्षक में अंतर

शिक्षक अच्छी बातों की शिक्षा तो देता है लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि वह शिक्षक उन बातों को अपने जीवन में अपनाता हो। वे अच्छे कथावाचक तो हो सकते हैं लेकिन उन कथाओं पर आचरण करना सभी के लिए संभव नहीं। उनकी कथनी और करनी में अन्तर हो सकता है। यही कारण है कि हमें विद्या ग्रहण करने बाद भी गुरु बनाने के लिए किसी पूर्ण संत महापुरुष की शरण में जाने की आवश्यकता पड़ती है। गुरु की महत्ता का वर्णन करते हुए श्री गुरु रामदास जी फरमाते हैं :

राम कृष्ण से को बड़ा, इन हो ने गुरु कीन
तीन लोक के नाइका, गुरु आगे अधीन ।
(तुलसीदास जी)

सहजो बाई ने कहा है :-

गुरु गोबिंद दोउ खड़े काको लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपणो,जिन गोबिंद दियो मिलाय ।
(सहजो बाई)

गुरु के बिना ज्ञान अधूरा

श्री राम ने कुलगुरु विशिष्ट मुनि से शिक्षा ग्रहण की और श्री कृष्ण ने गुरु संदीपनी के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए कहा है :-

“कुम्भे बंधा जलु रहै, जल बिनु कुम्भु न होइ।
ज्ञान का बधा मनु रहै, गुर बिनु ज्ञानु न होइ।” (आसा दी वार)
गुर बिनु घोरु अन्धारु
गुरु बिनु समझ न आवै ।।
गुर बिनु सुरति न सिधि
गुरु बिनु मुकति न पावै ।।
(सवइये महला 4 के 4) पंना : 727
बिनु सतिगुर किनै न पाइउ
बिनु सतिगुर किनै न पाइया ।।
सतिगुर विचि आपु रखिउनु
करि परगटु आखि सुनाइया ।।
(आसा दी वार पउड़ी)

जैसे कपड़ा कपड़े से और सोना सोने से जुड़ता है, वैसे ही जीवात्मा परमात्मा से मिल सकती है – केवल पूर्ण गुरु की कृपा से।

रविदास महाराज द्वारा गुरु स्वीकार

कुछ विद्वानों ने यह तर्क दिया है कि श्री गुरु रविदास महाराज जी ने उस निराकार, सर्वशक्ति सम्पन्न एक ईश्वर को ही अपना गुरु मान लिया था। जैसे :-

तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ।
हम कहीअत कलिजुग के कामी ।।1।।

अर्थात हे मालिक! तुम ही पूरे जगत् के गुरु हो परंतु महाराज जी ने अपनी पवित्र वाणी में बताया है कि उस मालिक से मिलने के लिए संत सद्गुरु की आवश्यकता होती है।

“तनु मनु अरपउ पूज चरावउ, गुर परसादि निरंजनु पावउ।”

महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि परमात्मा को पाने के लिए गुरु आवश्यक है, क्योंकि:

“परम परस गुरु भेटीऐ, पूरब लिखत लिलाट।”
उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट ।।

अर्थात पूर्ण गुरु ही हमारे वज्र कपाट के द्वार खोल सकता है। गुरु के बिना ईश्वर से मिलाप नहीं हो सकता। इस विचारधारा के अनुसार यह कहा जा सकता है कि महाराज जी ने भी अवश्य ही किसी महामानव (देहधारी) संत महात्मा को अपना गुरु बनाया होगा।

क्या रामानंद गुरु थे?

कई विद्वानों ने यह मान्यता दी, परंतु:

यह निश्चित कर पाना कठिन है कि सद्‌गुरु रविदास महाराज के गुरु कौन थे? भिन्न-भिन्न विद्वानों ने महाराज जी के गुरु बनाने के बारे में अनेक तर्क दिये हैं लेकिन उसमें से अभी तक कोई भी तर्क पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं हुआ। बहुत अधिक महान विद्वानों ने गुरु रामानंद को आप जी का गुरु कहा है परंतु सद्गुरु रविदास जी की वाणी जो कि गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है और अन्य प्रमाणित वाणी से भी यही स्पष्ट हुआ है कि आप जी ने कहीं भी रामानंद को अपना गुरु होने का उल्लेख नहीं किया। ये दंतकथायें जो पूर्ण अप्रमाणित हैं, आज के वैज्ञानिक और प्रमाणित युग में स्वीकार नहीं की जा सकतीं ।

  • गुरु रविदास जी ने रामानंद का नाम अपनी वाणी में “गुरु” रूप में नहीं लिया।
  • रामानंद कर्मकांड व बाहरी पूजा को मानते थे।
  • रविदास जी केवल नाम-भक्ति और सहज मार्ग के पक्षधर थे।
  • यदि कबीर को जाति के कारण दीक्षा नहीं मिली – तो रविदास को कैसे मिल सकती थी?

सतगुरु रविदास जी की वाणी से प्रमाण

माई गोबिंद पूजा कहा लै चरावउ अवरु न फूलु अनूपु न पावउ ॥

सद्गुरु रविदास जी ने दूध, फूल, जल आदि सारी पूजा सामग्री को जूठा कहते हुए केवल एक परमेश्वर हुए केवल एक परमेश्वर के नाम का ही स्मरण करने को कहा है। पूजा का नया वैज्ञानिक सिद्धांत देकर आप जी ने प्रभु नाम को ही पूजा सामग्री कहते हुए अपना तन-मन गुरु को अर्पित करने का संदेश दिया है। यह सारी सांसारिक सामग्री भगवान की पूजा के तुल्य नहीं है। प्रभु का स्मरण सच्चे हृदय से करके उस मालिक से अभेद हुआ जा सकता है। सद्गुरु जी की ऐसी पवित्र वाणी से प्रभावित होकर ही रामानंद जी ने ये शब्द कहे थे –

कत जाईऐ रे घरि लागो रंगु ।।
मेरा चितु न चलै मन भइउ पंगु ।।१।। रहाउ ।।
की एक दिवस मन भई उमंग ।।
घसि चंदन चोआ बहु सुगंध ।।
पूजन चाली ब्रहम ठाइ ||
सो ब्रहम बताइओ गुर मन ही माहि । । १ । ।
जहा जाईऐ तह जल पखान ।।
तू पूरि रहिउ है सभ समान ।।
बेद पुरान सभ देखे जोइ ।।
ऊहां तउ जाईऐ जउ ईहां न होइ ।।२।।
सतिगुर मै बलिहारी तोर ।।
जिनि सकल बिकल भ्रम काटे मोर ।।
रामानंद सुआमी रमत ब्रहम ।।
गुर का सबदु काटै कोटि करम ।।३।।१।। (पंना ११६५)

सद्गुरु रविदास जी के साथ स्वामी रामानन्द की गोष्ठी हुई होगी। इससे यह भी सिद्ध होता है कि सद्गुरु रविदास जी तो स्वामी रामानन्द के गुरू हो सकते है परन्तु स्वामी रामानंद का सद्गुरु रविदास के गुरु होने का प्रमाण कहीं भी नहीं मिलता। बिना किसी आधार के अप्रमाणित पैतृक कथाओं से यह मान लेना कि रामानंद सद्गुरु रविदास के गुरु थे, अनुचित है, निराधार है।

“तनु मन अरपर पूज चरावउ, गुर परसादि निरंजनु पावउ।”

ऐतिहासिक मतों के अनुसार रविदास जी के गुरु “संदन मुनि” (आदिवासी संत) माने जाते हैं।

अंतिम निष्कर्ष

  1. गुरु रविदास जी ने वास्तविक रूप से गुरु-धारण किया।
  2. रामानंद उनके गुरु नहीं थे।
  3. सतगुरु रविदास जी के गुरु एक देहधारी जीवंत संत – आदिवासी संत “संदन मुनि” थे।

यह लेख गुरु-तत्त्व, संत-मत और रविदास दर्शन की गहराई प्रस्तुत करता है।

✍️ Written by / लेखक

Mr. Sher Singh
President, Global Ravidassia Welfare Organization (India)

📚 संदर्भ (Footnotes)

  1. ‘बाणी श्री गुरु रविदास जी’ — गुरु रविदास चेयर, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़।
  2. प्रो. लाल सिंह — बाणी श्री गुरु रविदास जी और तत्सिद्धांत
  3. आदि ग्रंथ

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