परम पूज्य हजूर महाराज संत स्वामी गुरदीप गिरि जी – जीवन परिचय

परम पूज्य हजूर महाराज संत स्वामी गुरदीप गिरि जी – जीवन परिचय
परम पूज्य हजूर महाराज संत स्वामी गुरदीप गिरि जी महाराज

परम पूज्य संत हजूर महाराज स्वामी गुरदीप गिरि जी
गद्दीनशीन – डेरा स्वामी जगत गिरि आश्रम, पठानकोट

परम पूज्य हजूर महाराज संत स्वामी गुरदीप गिरि जी जीवन परिचय

गद्दीनशीन – डेरा स्वामी जगत गिरि आश्रम, पठानकोट (पंजाब)


भारतीय संत परंपरा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका जीवन स्वयं एक जीवंत ग्रंथ बन जाता है। ऐसे ही महान संत, समाज सुधारक और आध्यात्मिक पथप्रदर्शक हैं परम पूज्य हजूर महाराज संत स्वामी गुरदीप गिरि जी, जो आज डेरा स्वामी जगत गिरि आश्रम, पठानकोट (पंजाब) के गद्दीनशीन के रूप में गुरु रविदास मिशन का दीप जलाए हुए हैं।

🔶 संक्षिप्त जीवन परिचय (मुख्य जानकारी)

स्वामी गुरदीप गिरि जी महाराज
पूरा नाम परम पूज्य संत श्री श्री 108 स्वामी गुरदीप गिरि जी महाराज
जन्म तिथि 7 फरवरी 1961
जन्म स्थान गाँव भट्टियाँ, जिला गुरदासपुर, पंजाब
पिता श्री चरण दास जी
माता श्रीमती जीतो देवी जी
गुरु परम पूज्य संत श्री श्री 108 स्वामी जगत गिरि जी महाराज
गद्दीनशीन 25 दिसंबर 1975 (14 वर्ष की आयु में)
आश्रम डेरा स्वामी जगत गिरि आश्रम, पठानकोट
मुख्य उद्देश्य नशा-मुक्त समाज, शिक्षा का प्रचार, नारी सशक्तिकरण, सामाजिक बुराइयों का उन्मूलन, गुरु रविदास जी के “बेगमपुरा” संकल्प को साकार करना

🔶 जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

स्वामी गुरदीप गिरि जी महाराज का जन्म 7 फरवरी 1961 को पंजाब के जिला गुरदासपुर के गाँव भट्टियाँ में हुआ। आपके पिता श्री चरण दास जी और माता श्रीमती जीतो देवी जी धार्मिक, सरल और संस्कारवान व्यक्तित्व के धनी थे। बचपन से ही आपके जीवन में सेवा, करुणा और भक्ति के संस्कार दिखाई देने लगे थे।

बाल्यावस्था में एक गंभीर बीमारी के समय महान संत स्वामी जगत गिरि जी महाराज का आपके जीवन में आगमन हुआ। माता-पिता द्वारा आपको उनकी गोद में सौंपने के बाद चमत्कारिक रूप से आपका स्वास्थ्य ठीक हो गया। यहीं से यह स्पष्ट हो गया कि यह बालक साधारण नहीं, बल्कि गुरु-कृपा से अलंकृत एक दिव्य आत्मा है।

🔶 गुरु कृपा और आश्रम जीवन

आपकी प्रारंभिक शिक्षा सरकारी मिडिल स्कूल, भट्टियाँ में हुई। बाल सभाओं, गीतों और मंचीय प्रस्तुतियों में आपकी प्रतिभा सबका ध्यान आकर्षित करती थी। हास्य, वाणी-कौशल और निर्भीक अभिव्यक्ति ने बचपन में ही यह संकेत दे दिया था कि आगे चलकर यह बालक जन-जन की आवाज बनेगा।

बाल्यकाल में गंभीर बीमारी के समय स्वामी जगत गिरि जी महाराज की कृपा से आपका जीवन सुरक्षित रहा। माता-पिता ने आपको गुरु चरणों में अर्पित कर दिया, जिससे आपका जीवन पूर्णतः गुरु सेवा को समर्पित हो गया।

🔶 नाम-दीक्षा एवं गुरगद्दी

किशोरावस्था में ही आप स्वामी जगत गिरि जी महाराज की सेवा में समर्पित हो गए। उनकी अस्वस्थता के समय अस्पतालों में रहकर, दिन-रात सेवा करना, दवाइयाँ देना, देखभाल करना—यह सब एक साधारण बालक के लिए नहीं, बल्कि एक भावी संत के लिए ही संभव था।

2 दिसंबर 1975 को आपको स्वामी जगत गिरि जी महाराज से नाम-दीक्षा प्राप्त हुई। यह एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि आप उनके हाथों नाम पाने वाले अंतिम शिष्य बने।

25 दिसंबर 1975 को स्वामी जगत गिरि जी महाराज के ज्योति-ज्योत समाने के पश्चात्, मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में संगत के सर्वसम्मत निर्णय से स्वामी गुरदीप गिरि जी महाराज को गुरगद्दी पर आसीन किया गया। यह निर्णय गुरु-कृपा, सेवा, त्याग और संतों की मोहर का प्रतीक था।

🔶 संघर्ष, साधना और सेवा

जब आपने आश्रम की जिम्मेदारी संभाली, तब संसाधन अत्यंत सीमित थे—कुछ कमरे, थोड़े अनाज और सीमित साधन। न कोई आय का स्रोत, न अनुभव—फिर भी आपने गुरु-भरोसे के साथ सेवा का मार्ग चुना। पहला सत्संग, पहली नाम-दीक्षा और पहला भंडारा—सब कुछ अत्यंत सादगी और श्रद्धा के साथ आरंभ हुआ।

14 जून 1976 को आपने पहली बार नाम-दान प्रदान किया और स्वयं को सदैव “मालिक का सेवक” मानते हुए अहंकार से दूर रहने की प्रार्थना की।

🔶 गुरु रविदास मिशन का प्रचार

स्वामी जी ने अपना जीवन श्री गुरु रविदास महाराज की वाणी, दर्शन और “बेगमपुरा” के समाजवादी स्वप्न को साकार करने में समर्पित कर दिया। आपने काशी (बनारस), खुरालगढ़, पंजाब, जम्मू-कश्मीर सहित देश-विदेश में गुरु रविदास के ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन किए और संगत को अपने इतिहास से जोड़ा।

🔶 शिक्षा, सत्संग और समाज सुधार

  • नियमित सत्संग और नाम-दान
  • नशा-मुक्त समाज का संदेश
  • शिक्षा के लिए विद्यालय की स्थापना

🔶 सम्मान एवं उपलब्धियाँ

  • दलित साहित्य अकादमी गुरु रविदास राष्ट्रीय पुरस्कार
  • भाई वीर सिंह राष्ट्रीय पुरस्कार
  • कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा विशेष सम्मान

✨ निष्कर्ष ✨

स्वामी गुरदीप गिरि जी महाराज का जीवन सेवा, साधना और समाज-निर्माण का प्रेरणादायक उदाहरण है। आप आज भी गुरु रविदास महाराज के बेगमपुरा स्वप्न को साकार करने में निरंतर अग्रसर हैं।

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